नाम-माधवी गणवीर
राज्य-छत्तीसगढ़
कविता
दूसरी निर्भया
न ख़ौफ़ न भय कैसी ये दरिंदगी मची है,
अब कहा बहन बेटी यहां सुरक्षित बची है।
पापा की रानी,परी,गुड़ियाँ शहजादी थी,
आजादी के परवानो ने दी उसे ही जान से आजादी थी।
माँ के आंख का काजल जार-जार हो गया,
प्रशासन,फिर चीखती प्रियंका का कर्जदार हो गया।
निर्भय हो लूट रहे है अबलाओं की आबरू,
अपने कलेजे के टुकडे की कैसे हिफाजत मैं करू।
जानवरो से भी बत्तर हो गई इनकी कुत्सित नियत,
बोटियां नोचने लगे बेटियो की वाह.. रे इंसानियत।
शासन प्रशासन कब तक भरेंगे अपनी झोलियां,
राजनीतिक कुर्सी हथियाने की कब तक चलेगी बोलियां।
अब तो हर माँ के चेहरे पे छाया भय का आतंक,
छाती पटती कहती है क्या.. कभी होगा इसका अंत।
किरदारों में ही दिखते है अस्मत बचाने वाले लोग,
यहाँ तो कोने-कोने में छिपे है अस्मत लूटने वाले लोग।
माधवी गणवीर
व्याख्याता
जिला-राजनांदगांव
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