जिला - राजनादगांव
शीर्षक - छु ले प्रखर
कविता
ज्वाला जो धधक चुकी,
मन की धूल उफन चुकी,
राह के कांटे देख
अक्ष तु, न सिहर, न सिहर,
बढ़कर छू ले प्रखर, छू ले प्रखर।
तम भरा सारा आकाश,
आशा से जागे विश्वास,
दुख रे तु, दम न भर,
नहीं ठहरता कोई पहर, कोई पहर।
अब जागा है जुनून,
अब मिलेगा मुझे सुकून,
वक़्त न कभी ऐसा आया,
कदम न जाए जो ठहर,जो ठहर,
बढ़कर छू ले प्रखर, छु ले प्रखर।
माधवी गणवीर
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