निवास-बसना,महासमुंद
विषय- मजदूर
विधा-मुक्त छंद मुक्तक
*मजदूर*
(१)
न खुशियों की अधिकता है ,न सुख से दूर रहते हैं।
न मरने की कोई चिंता,न ही मजबूर रहते हैं।
जमाने में सभी ऊँचे इमारत जो बनाते हैं।
झोपड़ी में बिना सुविधा,वही मजदूर रहते हैं।।
(२)
न कोई कर्ज है इनपर,न कोई भी खजाना है।
सुबह से शाम करके काम ,घर जिनको चलाना है।
नहीं कमजोर हैं मजदूर ये निर्माण के भगवन।
है इनका लक्ष्य बस इतना के दो रोटी कमाना है।।
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