जिला-महासमुंद
विधा-लावणी छंद
शीर्षक-विनम्रता
★★★
सुगम सहजता से महकेगा,निज मन का कोना-कोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।
१
प्रेम वही पाता है जग में,जिसका पावन भाव रहे।
नहीं भावना हो बदले की,नहीं मनन में ताव रहे।
वीणा सम झंकार मधुर हो,जिसकी अनुपम बोली में।
प्रथम-दृष्टि में हृदय जीत ले,अपनी हँसी ठिठोली में।
विनम्रता ही फलित करेगा,प्रेम बीज जन में बोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।
२
अकड़ दिखाकर कहाँ निभा है,मानवता की रीति यहाँ।
कटुक वचन वाला भी ढूँढे, हरपल पग-पग प्रीति यहाँ।
विनम्रता भी लेख भाग्य का,कहाँ सभी को मिलता है।
सरल-सहज व्यवहार रहे तो,पुहुप सुखों का खिलता है।
नम्र नहीं जिसका मन उसको,पड़ा अवज्ञा ही ढोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।
३
धर्मग्रंथ के पन्नों से भी,विनयशीलता पाएँ हैं।
इसीलिए प्रभु के वचनों को,सभी प्रेम से गाएँ हैं।
उस मानव का मूल्य कहाँ है,जिसके मन अभिमान भरा।
कुविचारों को जिसने त्यागा,वही बनेगा स्वर्ण खरा।
उठो साथियों दंभ त्यागकर,छोड़ो निज मद में सोना।
सबकुछ कर लो सरल स्वयं को,सबसे कठिन सरल होना।।
*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*
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