रचनाकार-प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला-महासमुंद
विधा-दोहा
विषय-धरा
शीर्षक-धरती
★★★
सराबोर सुख से हुआ , अपना मन आकाश।
धरती भी सुरभित हुई , पाकर सूर्य प्रकाश।।
फैल गई उजली किरण,सुरभित सब तृण पात।
प्रखर सूर्य के संग में , आया पुण्य प्रभात।।
मन वीणा के तार में , उठने लगी तरंग।
जब फैली स्वर्णिम किरण,शुभ प्रभात के संग।।
लगे चहकने खग सभी , अलि करता गुंजार।
सूर्य किरण पाकर हुआ,जब सुरभित संसार।।
फेंक रहा धरती सुरभ, मोह जाल का पाश।
प्रखर सूर्य ने जब किया, अंधकार का नाश।।
जब-जब सूरज ने किया, धरती को आलोक।
अंधकार के संग में ,मिटा तमस घन शोक।।
स्वर्ण किरण की लालिमा , जैसे पावन हेम।
सूर्य ओज मन में भरो ,उठ प्रभात में *प्रेम*।।
*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*
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