जिला-महासमुंद
विधा-दोहा
शीर्षक- मन
, मन
मन वीणा के तार में,रमे राम का नाम।
श्रेष्ठ करे मनभाव को,सभी बनाये काम।।
मन मंदिर में दीप जो,टिम-टिम करती नित्य।
सदा सहेजे भाव को ,और लिखे साहित्य।।
मनभावों में प्रेम हो,और हृदय में ज्ञान।
तभी बने संसार में,मानव परम महान।।
मन को जिसने जीत ली,जीत लिया संसार।
जीत जीत में जीत है,जीत भगाये हार।।
मन से मन को छेड़कर,मन में भर दो प्रेम।
मन ही मन को दे रहा,मन का मन-मन हेम।।
व्यर्थ किया अपना जनम,धार कलंकित भेष।
मन में निशिदिन भर रहा,मन से मन-मन द्वेष।।
मन से मत हारो कभी,मन को लेना जीत।
मन को जो मंदिर करे,वही प्रेम का गीत।।
*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*
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