Tuesday, March 2, 2021

प्रेमचन्द साव "प्रेम" की रचना- पलाश

नाम- प्रेमचन्द साव "प्रेम"
जिला -महासमुंद
विधा-  दोहा
विषय-पलाश
शीर्षक-पलाश

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नित सुरभित होने लगा,धरती से आकाश।
आम बौर से लद गए,खिलने लगे पलाश।।

पुरवाई चलने लगी,लेकर सौंधी गंध।
कोयल कुहुके बाग में,बाँध प्रीति अनुबंध।।

सरिस पुहुप झड़ने लगे,लेकर खुशबू संग।
मौसम हुआ बसंत का,उड़ने लगे विहंग।।

पगडण्डी में धूल की,उड़ने लगे गुबार।
दुर्लभ है वह दृश्य अब,बदल गया संसार।।

खुशी जताने है लगी,लता कली सब झूम।
सूरज भी होकर युवा,रहा धरा को चूम।।

मेलों का,त्यौहार का,बेला यही बसंत।
खुशियाँ ही खुशियाँ बढ़ी,हुआ दुखों का अंत।।

इस बसंत में नित्य ही,बरस रहा है हेम।
और खुशी में झूमकर,गीत सुनाये *'प्रेम'*।।

*रचनाकार*
*प्रेमचन्द साव "प्रेम",बसना*

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