Friday, May 15, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से आनंद कुमार त्रिवेदी की रचना- सदासुहागन

रचनाकारः- आनंद कुमार त्रिवेदी
                सोण्डका, खरसिया
शीर्षक ः-  "सदासुहागन  "
विधाः-    कविता

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हे! धर्मपथ अनुगामिनी,
   सुशोभित हर घर आँगन।
प्रकृति पुरुष की भामिनी,
   जय हो तेरी सदासुहागन।।

भीषण ग्रीष्म हो चाहे ऋतु,
     या हो पावस घनघोर।
कड़कड़ाती शीत में भी रहतीं,
   शांत प्रमुदित सबओर ।।

कैंसर हो या खाँसी खराश,
    मधुमेह का भी करती उपचार।
धवल गुलाबी रंग सुमन का,
   धरती रुप हो आठ प्रकार।।

बारुद को बिखराती तुम हो,
    करती शुचि पर्यावरण।
ज्यों सती की सत शक्ति,
   होती गृह सुरक्षा आवरण।।

हे!सुमुखी हे!सदाबहार ,
   हे! नयनतारा हे!गुलबहार।
रहना तुम निज धर्म-कर्म रत् ,
करना सदा मानव पर उपकार।।

        आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद"

व्याख्या ---

     उक्त कविता में हर घर आँगन में मिलने वाली सदाबहार पुष्प का 
स्तवन किया गया है।सदाबहार पुष्प की उपमा साक्षात् प्रकृति स्वरुपा लावण्यमयी सद्गुणी स्त्री से की गई है।
     जिस प्रकार एक सगुणी नारी सब प्रकार के ऋतुओं(दुख-सुख) को झेलते हुए हमेशा हँसमुख और धीर रहकर अपने परिवार को मजबूती प्रदान करती है उसी प्रकार यह बहुगुणी पौध भी हमें कैंसर मधुमेह जैसे अनेक रोगों से बचाती है ।
   यह आठ प्रकार की होती है और सदाबहार, नयनतारा आदि अनेक नामों से जानी जाती है।
    

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