जिलाः-रायगढ़
विषयः- स्थायी भाव हास्य आधारित रचना।
शीर्षक ः- "हँसगुल्ले "
विधाः- छंद मुक्त कविता
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बड़ा महत्व है,
मिष्ठान्न में रसगुल्ले का।
और बड़ा महत्व है,
जिंदगी में हँसगुल्ले का।।
गर जिंदगी में हँसगुल्ले न हो,
तो जीवन हो जाता रेगिस्तान।
हँसी खुशी रौनकता दफन हो,
बन जाता जीवन कब्रिस्तान।।
मुस्कुराना ही जीवन है प्यारे!
इसी से है आबाद जहान।
हँसाना बहुत कठिन लोगों को,
रुलाना तो है बड़ा आसान।।
एक वाकया सुनाता आपको,
आए हँसी तो हँस लेना।
आभार की है नहीं जरुरत,
दूसरों को बाँट बस देना ।।
मित्र सो रहे थे गहरी नींद में,
अपने इकलौते पिता के साथ।
हँसगुल्ले सपने देख-देख,
चला रहे थे निज पैर-हाथ।।
अचानक पिताजी किये रसीद,
एक थप्पड़ उसके गाल पर।
सपने टूटकर बिखर गये सब,
मायूस हुआ देख हाल पर।।
दरअसल सपने में प्रिय मित्र,
रेस में बाइक चला रहे थे।
एक्सिलेटर दबा रहा हूँ समझ,
कान पिता का हिला रहे थे।।
सपने भी होते हैं अजीब,
कभी अमृत पिला देते।
राजा से रंक बना देते,
कभी थप्पड़ खिला देते।।
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व्याख्याः---प्रस्तुत रचना में जीवन में मुस्कुराहट की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता को एक हास्य प्रसंग के साथ बताया गया है।
यदि मानव हँसे-मुस्कुराए नहीं तो उसके जीवन में रौनकता नहीं रहती और वह उदास रहता है।
इसी के साथ सपने की विचित्र दुनिया का भी एक संदेश दिया गया ,मानव मन की सुसुप्तावस्था एक अनसुलझी पहेली है।
आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद "
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