रचनाकारः- आनंद कुमार त्रिवेदी
"आनंद"
जिला... रायगढ़
विधा....गीत (छत्तीसगढ़ी)
शीर्षक..."मया के ताज "
---------- ------ ---------
अमर करे पियार हमर,
एक महल बनाबो जी।
नई पाबो संगेमरमर,
माटी के भीथी उठाबो जी।।
....... ।...... ।.......
जमना नई हावय गाँव त,
नरवा-झोरखी तीर सही।
ताज कस नई सकबो,
त कच्चा झोपड़ी ही वो रही।।
डोली के धान लू के,2
ओ म खदर छवाबो जी।
अमर करे.....
महल भीतर म झरना,
मया-पियार के झरही जी।
नोनी अउ बाबू हमर,
मन के ओ म तैरही जी।।
फोटो रही दूनों झन के,2
अइसन टाटी धराबो जी।
अमर करे.....
अँगना म बिही-बोईर के,
बिरथा ल लगाबो जी।
आमा डाही म एक,
झूलवा घलो धराबो जी।।
गाँ भर के बाल गोपाल,2
झूलवा म झूलाबो जी।
अमर करे....
घर के दीवार मया के,
छापा ल छपवाबो जी।
मई दुआर म हमन,
"पियार के घर "लिखवाबो जी।
मया के ताजमहल,2
दुनिया ल देखाबो जी।
अमर करे....
_______________________________
व्याख्या .....दू परेमी (नायक-नायिका) अपन के मया पिरीत ल अमर बनाय खातिर मिल के सज मढ़ात हाँवय।
ताजमहल कस तो नी बनाय सकें फेर ताज ले कम नी ए ऊँकर कलपना के घर।जेकर टाटी,दीवार, घर,अँगना जमो कति मया के कहर हर बगरत हवय।
गाँव के परिवेस म जो संसाधन उपलब्ध हावय वही म लोग
लईका गाँव परिवार संग रके दूनो परानी के बरोबर सहभागिता करत हावँय दूनों प्रेमी,गीत म इ भाव ल कहे के परयास किये गय हे।
_आनंद कुमार त्रिवेदी
No comments:
Post a Comment