रचनाकारः-आनंद कुमार त्रिवेदी
जिलाः-रायगढ़
विषयः- रति स्थायी भाव आधारित आनुप्रासिक कविता
शीर्षक ः- "रति "
विधाः- छंद मुक्त कविता
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रति ने रतिभाव रचाकर के,
काम से हर काम करा ही लिया।
रतिभाव रमे रमणी तन में,
रच व्यूह रितुराज जगा ही दिया।।
धर कैकसी रुप रति ने मुनिश्रेष्ठ,
विश्रवा कामातुर बना ही लिया।
मेनका नयनों की कटाक्ष से तप,
विश्वामित्र का भंग करा ही दिया।।
उपकार से सृष्टि सृजन रति के,
प्रेम सनेह श्रृंगार धरा पर।
लाती रुप वासनामय विकृति,
रह जाती न ये अविकारी बराबर।
रमे रति-काम रवा मन में,
हर जीव जगत हर कन-कन में।
रस रुप रमे श्रृंगार रतन,
रजनीश रमे ज्यों तारा गन में।।
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व्याख्या ः- प्रस्तुत कविता में श्रृंगार रस के स्थायी भाव रति को आधार मानकर ।रति और काम की हर प्राणी में उपस्थिति और उनका सृष्टि सृजन में महत्ता को बताया गया है जबकि रति का दूसरा रुप विकृति उत्पन्न करता है।
साहित्य में श्रृंगार रस सबका राजा बतलाया गया है।पौराणिक गाथाओं को उदाहरणार्थ समाविष्ट किया गया है।
आदि और अंत में कविता आनुप्रासिक बनाने का प्रयास है।
आनंद कुमार त्रिवेदी "आनंद "
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