निवास स्थान- खरसिया जिला रायगढ़
विधा-आलेख
विषय-
हिन्दी, हिन्दुस्तान की पहचान है। राष्ट्रभाषा के ताज के मार्ग में अड़चनें तो है पर,हिन्दी को बांध सके वो सीमा कहीं नहीं :
आजादी के बाद भारत में भाषाओं को लेकर अनेक विवाद और आंदोलन हुए, किंतु भाषा से जुड़े प्रश्नों का हल आज भी नहीं मिल पाया है। जबकि विवादों और आंदोलनों से हिंदी सहित भारत की अधिकांश क्षेत्रीय और आंचलिक भाषाओं को हानि ही उठानी पड़ी। आज वस्तु स्थिति यह है कि कथी पथ हिंदी वाले हैं हिंदी की अक्ष्मयता को सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। देखा जाए तो उनके तर्क में कोई युक्ति संगत तथ्य नहीं होता, उनकी बातें महत्वपूर्ण लगती है। क्योंकि प्रयोग की स्तर पर भारत में सरकारी तंत्र हिंदी का विरोधी रहा है।सबसे दुखद बात यह है कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के विरुद्ध हम टिप्पणियां सहन कर लेते हैं। राजनीतिक कारणों से ही हमारी समक्ष राष्ट्रभाषा हिंदी सामर्थ्य एवं समृद्ध भाषा नहीं लगती। विनोबा जी ने विश्व हिंदी सम्मेलन में चिंता व्यक्त करते हुए। 1975 मैं कहा था केवल सोलह करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा स्पेनिस को संयुक्त राष्ट्र ने मान्यता दी है। और 50 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा हिंदी को मान्यता नहीं दी गई है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है।विश्व स्तर पर हमने हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने का असफल प्रयास तो किया। किंतु अपने ही राष्ट्र में प्रतिष्ठित नहीं कर पाए। राष्ट्रभाषा हिंदी का सम्मान तो हिंदी को प्राप्त है।किंतु उसका प्रयोग राष्ट्रभाषा की मर्यादा के अनुकूल नहीं हो रहा है। मॉरिशस के पूर्व प्रधानमंत्री शिवसागर रामगुलाम ने कहा था। हिंदी भाषा को लेकर पिछले 150 वर्षों से हमने पूर्वजों की परंपराओं को मारीसिस में जीवित रखा है। तो प्रश्न यह है कि क्या हम भारतीय भी अपनी परंपराओं के प्रति सचेत जागरूक एवं संवेदनशील हैं शायद नहीं चूंकि राष्ट्रभाषा को मात्र कागजी दर्जा ही मिला है। व्यवहारिक सम्मान प्राप्त नहीं है। आज सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों के अधिकतर अधिकारी हिंदी का प्रयोग करना या हिंदी बोलना अपना अपमान समझते हैं। हिंदी के नाम पर हर वर्ष विभिन्न सरकारी कार्यालयों एवं प्रतिष्ठानों में हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा मनाया जाता है। किंतु इसमें क्या लाभ जब तक हिंदी का प्रयोग हर दिन नहीं होगा। इसका कोई औचित्य नहीं होगा। सही अर्थों में हिंदी को स्मरण करना इसे प्रयोग में लाया जाना आवश्यक है। आज अखिल विश्व में मातृभाषा में बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा बच्चों का अधिकार माना गया है। क्योंकि मातृभाषा भाषा में विषयों की गहयता अधिक होती है।यह भी जानने और याद रखने की जरूरत है मातृभाषा के माध्यम से ही एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपनी संस्कृति संस्कार और विचार प्रेषित करती है। इस प्रेषण के रुकाव से ही समाज में अनेकों विकृतियों और अपस संस्कृतियों जन्म लेती है। आज की सामाजिक समस्याएं और पश्चिमी अपसंस्कृति की प्रति भारत में बढ़ते मोह भारतीयता और भारत में भाषाई आत्म सम्मान को भुला देने का कारण वे प्रतीत होते हैं। अब वक्त आ गया है कि हमें भारतीयता की रक्षा के लिए भारत की अस्मिता के लिए हिंदी सहित अन्य सभी क्षेत्रीय आंचलिक भाषाओं के दिशा में सार्थक पहल करना चाहिए।देखा जाए तो अंग्रेजी परस्त लोग ऐसी आवश्यकता और उसके लिए पहल करने की बात पर आदतन प्रश्न चिन्ह लगा सकते हैं। उन्हें यह उत्तर दिए जाना उचित लगता है कि हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाएं मिलकर भारत की अस्मिता संस्कृति परंपराओं और संप्रभुताओं का आधार बनती है।इन भाषाओं का वस्तु परख विकास करने पर समाज में भी अपना उचित स्थान स्वयं प्राप्त कर लेगी।
लेखक
डिग्री लाल जगत निर्भीक
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