Thursday, May 14, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- समर्पण

रचनाकार- डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिला -रायगढ़
शीर्षक -समर्पण
विधा -कविता
         समर्पण
करूं समर्पण निश्छल भाव से
 प्रभु ऐसे भाव जगा देना,
सत-पथ पर  चलूँ स्वामी
ऐसा सद विवेक जगा देना।
जैसे जल बिन मछली तड़पे
एक पल विलग न रह पाये,
पीर ऐसी अंतस में जगा देना।
तुम ही तो अमृत पारस हो
कर स्पर्श मुझे हीरा बना देना
दिनों के प्रति स्नेह धरूँ
प्रभु ऐसे भाव जगा देना।
सदा चलूं सद पुरुषों के पथ पर
ऐसे भाव बना देना
कर पाऊं जग में सत्कर्म
प्रभु ऐसी शक्ति जगा देना।
विश्व में तुम्हारा विराट रूप देखूं
जन-जन के मर्म को समझूँ
मानवता की अलग जगाऊं मैं
प्रभु निर्मलो का कष्ट हरू।

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व्याख्या-

            कवि समर्पण भाव से प्रभु से प्रार्थना कर रहे हैं की हे प्रभु मेरे अंतरात्मा में निश्चल भाव( पवित्र भाव) जगा देना मैं सत्य पथ पर चल सकूं और मेरी अंतरात्मा में सदाचार और विवेक का भाव जगा देना जिस तरह बिना जल के मछली तड़पती जल से एक पल भी विलग नहीं रह पाती इसी तरह हे पीर( ईश्वर) मेरे अंतरात्मा निश्चल भाव सत्य सदाचार विवेक जैसे मानवीय गुणों के विना मैं भी जिंदा ना रहूं अर्थात हर पल हर क्षण मानवीयता के साथ जी पाऊं ऐसी भाव सदा बनाए रखना। मुझे ऐसे प्रेरणा दीजिए जिस तरह मैं पारस पत्थरों में मूल्यवान है। स्पर्श से लोहे को सोना बना देता है इसी तरह प्रभु मुझे भी अमानवीयता से मानवीयता मैं जीने का प्रेरणा देना जिससे मैं मूल्यवान बनकर गरीबों के प्रति मेरा स्नेहा भाव हो और मैं हमेशा सदाचारी पुरुषों के साथ चलूं ताकि मुझे कहीं भटकाव ना हो ऐसी भाव जगा देना। हे प्रभु मैं संसार में सत्य कर्म करूं मुझे ऐसी शक्ति( प्रेरणा) देना और विश्व में तुम्हारा विराट स्वरूप को देख पाऊं अर्थात मेरे अंदर आपको ज्ञान स्वरूप मैं देख पाऊं हर लोगों की संवेदना को समझ पाऊं तथा जो लोग अज्ञानी अमानवीयता मे जी रहे लोगों को मैं अलग होकर मानवीयता का पाठ पढ़ाऊ और गिरे हुए निशक्त लोगों का कष्ट दूर कर पाऊं हे प्रभु मुझे ऐसे सन्मार्ग पर ले जाना मैं आपसे ही समर्पण करता हूं
डिग्री लाल जगत निर्भीक

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