Tuesday, June 2, 2020

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ से डिग्री लाल जगत निर्भीक की रचना- हमर गांव

रचनाकार-डिग्री लाल जगत निर्भीक
जिला-रायगढ
विधा- कविता
शीर्षक- आबे हमर गांव

 आबे हमर गांव
लीम ,पीपर, तेन्दु ,महुआ के छांव
नदिया के तीर बसे हे मोर गांव।
मोर मयारू आबे हमर गांव
रहि रहि के आथे तोरेच सुरता।
का कहि के समझाअवं मन बइरीला
समझाए ले नई समझय।
देखत रइथो तोर रद्दा
मोर मयारू आबे हमर गांव।
घर के अंगना मा लगे हे तुलसी चंवरा
अऊ लगे हे आनी बानी के फूल।
बागे बगीचा मा कोयल हर कूहके
केकती केवरा घलो हांसत हे।
भात पसीया घलो नई सुहावय
रहि रहि के आथे तोरेच सुरता।
मोर मयारू आबे हमर गांव
नदिया के तीर बसे हे मोर गांव।

डिग्री लाल जगत निर्भीक

______________________

व्याख्या- इ कविता म कवि हर अपन गंवई गांव के बरनन सुघर ढंग ले करे हे कवि ह अपन मयारू नाता रिश्ता मन ल सुरता केअपन गांव ल देखे बर बुलात हावय कवि हर अपन गांव के परसंसा के वरनन करत कथे हे मयारू तै मोर गांव आबे मोर गांव ह नदिया के तीर म बसे हाबे।आऊ मोर गांव अब्बड रूख रही लीम,पीपर, केन्दु, मौहा के छांव हे मयारू तोर घरी बेरी सुरता आथे तै हमर गांव आबे ।मोर मन बइरी नई मानय कतको समझाए ले नई समझय मै तोर रद्दा घरी बेरी देखत रहिथो ये मयारू तै मोर गांव आबे ।घर के अंगना म तुलसी चौरा अऊ अंगना म आनी बानी के फूल घलो हे तीर के बगीचा म कोइली हर कूक थे,अऊ केकती केंवरा के फूल हर कूक थे अऊ केकती केवरा के फूल हर बहुत अच्छा फूले हे ऐसन लगत हे कि फूल हर हासत हे ।मै तोला अब्बड सुरता करत हो तोर सुरता म भूख पियास नई लागे तोर हर घरी वेला तोरेच सुरता आथे मोर मयारू तै मोर गांव आबे।मै तोर रद्दा देखत रहूं।

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