विधा -लेख
जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
शीर्षक-शौर्य भूमि सोनाखान
छत्तीसगढ़ के राजधानी से लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऐतिहासिक ग्राम सोनाखान जिसके नाम से ही स्थान का परिचय हो जाता है सोनाखान सोने का भंडार धरती गर्भ में भरा पड़ा हो ,उस स्थान पर क्रांतिकारी वीर नारायण सिंह वीर सपूत का जन्म हुआ। वर्तमान में सोनाखान गांव अब जमीदार का महल नहीं है किंतु अवशेष के रूप में खंडहर है। उनके परिजन झोपड़ी नुमा घर में रहते हैं।गांव के पश्चिम में एक छोटी पहाड़ी है जिसका नाम कुरू पाठ एक ऐसा स्थान है। जहां साधारण रूप से तो कोई नहीं जा सकता उसका रास्ता जाना सरल था यहां छोटी सा झील है जहां सदैव पानी रहता है। उक्त स्थल बहुत ही मनोरम है। कुरू पाठ के उत्तरी छोर में बड़े तालाब है राजा सागर तथा दक्षिण में एक तालाब मंद सागर वीर नारायण सिंह द्वारा खुदवाये गएथे, वे उसी स्थान पर स्नान किया करते थे। आज की बस्ती नई है, पुरानी बस्ती तालाब से लगी हुई थी माह दिसंबर 1857में इन्हीं बस्तियों पर ब्रितानियों ने हमला कर अन्याय अत्याचार किए थे। अंग्रेजों ने मासूम बच्चों को पकड़कर धधकते आग में झोंक दिया था। अंधाधुंध गोलियां चलाकर सैकड़ों निर्दोष नर नारीयों को मौत की घाट उतार दिया था। आसपास की बस्तियों के लोग सेनापति के भय से घर छोड़कर जंगल की ओर भाग गए थे। कुरू पाठ डोंगरी में युवराज वीर नारायण सिंह के वीर गाथा जिंदा इतिहास दफन है जहां पुरातत्व विभाग द्वारा कुछ खुदाई की गई है, युवराज नारायण सिंह के पास एक घोड़ा था जो की स्वामी भक्त था, जिसका रंग कबरा था वे घोड़े पर सवार होकर सुबह का भ्रमण किया करते थे सुख दुख दर्द सुना करते थे सोनाखान इलाके में एक नरभक्षी शेर का आतंक फैला था मनुष्यों एवं पालतू जानवरों को मारकर खा जाता था प्रभावित क्षेत्र की प्रजा जमीदार नारायण सिंह से सुरक्षा की मांग करने लगे बहादुर युवराज नारायण सिंह 35 वर्ष के हष्ट पुष्ट बलिष्ठ नौजवान थे उनमें अपूर्व उत्साह था प्रजा की सेवा करने हमेशा तत्पर रहा करते थे उन्होंने दरिंदे शेर को मार डालने की ठान ली वह हमेशा बंदूक लेकर नरभक्षी शेर का जंगलों के बीहड़ों में खोजते रहे बहुत दिनों तक शेर का पता नहीं चला अचानक एक दिन रायपुर के कसबाई क्षेत्र में उत्पात मचाने लगा युवराज नारायण सिंह मुकाबले के लिए शेर के सामने लगभग निहत्थे खड़े हो गए शेर ने युवराज पर आक्रमण कर दिया मुकाबला होने लगा तब म्यान से तलवार निकालकर शेर को मार डाला शेर तो आखिर शेर ही था लेकिन वह सवा सेर थे वह सचमुच में गोंडवाना के शेर थे इस बहादुरी से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार वीर की पदवी से सम्मानित किया तब से उनके नाम के आगे वीर जुड़ गया और वीर नारायण सिंह नाम से जाने जाते हैं।
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