विषय :- बारिश
विधा :- मुक्तक
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1.
चली आयी जहाँ पावस, लगी वसुधा वहाँ गाने,
बड़ी बारिश लुभावन है,लताएँ चल पड़ी छाने।
मयूरी देख के बादल, अमन से नृत्य करती है,
गरज कर ताल देते हैं, बरसते मेघ के गाने।।
2.
कभी बादल गरजते हैं, धरा से नेह जतलाने,
कभी धरती तड़पती है, गगन को नेह समझाने।
चटख आयी धरा की गोद से, नवकोपले देखो,
चली आरोहणी बनकर, बिछोही प्रेम को पाने।।
3.
चली अब मेघ की बूँदें, नदी के नेह को पाने,
नदी के नेह को पाकर, चली सागर समा जाने।
नियम धरती बनाती है, इसे ना छेड़ना प्यारों,
नहीं बारिश मिलेगी ना, कभी बादल न पैमाने।।
व्याख्या :- पावस ऋतु का महत्व और बखान।
डॉ ओमकार साहू "सर्द"
प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
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