निवास :- प्रेमनगर, सूरजपुर,छ0ग0
विधा :- सायली छंद
शीर्षक :- कर्मज्ञान
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हे
पार्थ सुनों,
कर्मभूमि की कहानी
लागै हरि,
बखानि।
स्वप्न,
ना बुनों,
रणभूमि में जवानी,
माँग रही,
बलिदानी।
उठो,
कर्म चुनों,
धर्मभूमि की कहानी,
केवल कर्म,
निशानी।
जागो,
वीर धनंजय,
जन्मभूमि में गांडीव,
जाती रहे,
पहचानी।
बृहन्नला,
फूँफकार भरो,
रणभूमि में चाहे,
पड़े शव,
बिछानी।
व्याख्या :- मोह बंधन में बंधकर जब मानव धर्मपथ से विमुख होता है, तब-तब कर्मज्ञान ही
सद्मार्ग प्रशस्त करती है।
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