निवास :- प्रेमनगर, सूरजपुर,छ 0ग0
शीर्षक :- *अहंकार की गति
विधा :- गीत
*मानुष नश्वर तन पाया है, धर गीता का ज्ञान,
*रे पगले$$$ मत कर तू अभिमान।
अभिमान मन घर कर जाता,
अतिविश्वास बुद्धि हर जाता।
*अहंकार के प्रेमफाँस में (2)
*निश्चय अवनति जान रे पगले $$$...
रावण ज्ञान ब्रम्हांड बढ़ा तब,
समग्र कुल अभिमान चढ़ा तब।
*एक-एक आनन भूमि गिरते (2)
*अमृत ना बचायें प्राण रे पगले $$$...
कितने शासक मद में डूबे,
भारतवर्ष को लुटे-ख़सूटे।
*प्राण तज़ा अभिमानी सिकंदर (2)
*पाकर आत्मज्ञान रे पगले $$$...
असुरों का तप जग में बड़ा था,
अहंकार तब वर से बड़ा था।
*देव मनुज़ संग तांडव करते(2)
*खींच नोंच ले जान रे पगले $$$...
माटी का तन माटी होगा,
अटल सत्य परिपाटी होगा।
*तेरा मेरा नश्वर काया (2)
*ज्ञान का कर संधान रे पगले $$$...
व्याख्या :- अहंकार कि दुर्गति सदैव विनाश के मुहाने जाकर ही थमती है। चल और अचल संपदा ही अभिमान मुख्य कारक हैं जो निमित्त मात्र भौतिक सुख के साधन हैं। नश्वर प्राणियों के ज्ञान को स्मरण में और अहंकारियों को इतिहास में उदाहरण के स्थान मिलता है।
#काव्य संसद
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