प्रेमनगर,जिला - सूरजपुर, छ0ग0
विषय :- प्रेम
विधा :- काव्य
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*गणिका का किया उद्धार, कहीं जूठे बेरों से प्यार,*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
*तोड़ी छुआछुत दीवार, पहुँचे स्वयं भीलनी द्वार,*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
यहाँ सब स्वार्थ के धंधे हैं,
यहाँ सब धरम में चंदे हैं,
यहाँ रिश्तों के फँदें है,
*केंवट प्रीति अपार, कहे जो गुहा को सरकार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
सती अनुसुइया शक्ति को,
कभी मीरा की भक्ति को,
कभी राधा अनुरक्ति को।
*नमन है उनको बारम्बार, हलाहल कर दिया जो रसधार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
शक्ति कभी जननी होती है,
शक्ति कभी भगिनी होती है,
शक्ति कभी पत्नी होती है।
*लुटाए ममता और दुलार, नारी ही शक्ति का अवतार...*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
वतन में जान लुटाते हैं
देश का मान बढ़ाते हैं,
भाल भूमि में नवाते हैं।
*हंसकर झूल गये रखवार, दिया है आज़ादी उपहार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
प्रेम भावों का भूखा है,
निहित सद्ज्ञान अनूठा है,
अमर तृष्णा का बूटा है।
*समझों प्रेम जगत आधार, कहे है "सर्द" साहू ओमकार....*
*इसे ही प्रेम कहूँगा, इसे ही प्रेम कहूँगा।*
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#काव्यसंसद#
व्याख्या :- प्रेम भावनाओं का वह सेतु है जो किसी भी जातिविशेष, धर्म और बंधन से परे है। देश से हो तो देशप्रेम, रिश्तों में हो तो मोह, भक्त को हो तो भक्ति और सती का ही तो शक्ति, जाने कितने रूपों में विद्यमान है जगत में।
बहुत सुंदर प्रेम पारखी हैं आप
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