प्रेमनगर, सूरजपुर, छ0ग0
विधा :- छंद मुक्त
शीर्षक :- प्रकृति की पुकार
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*है प्रलयंकारी मार सुनों,
*अब दसों दिशा चीत्कार सुनों
*हाँ वसुधा ने अंगड़ाई भरी
*प्रकृति की ये टंकार सुनों.....
1. धरा शेषफन डोल रही,
विध्वंसक भाषा बोल रही।
*कोरोना का कहर टूटा ही नहीं
*अम्फान की फूँफकार सुनो ..... है प्रलयंकारी
2. जब वायु वेग प्रचंड हुआ,
मानो धरणी को दंड हुआ।
*जब वसुंधरा संतुलित नहीं,
*किसी ओर नवेगा भार सुनो.... है प्रलयंकारी
3. जब मेघों का आवेश बढ़ा,
कलपुर्जों का समावेश बढ़ा।
*श्रमिकों को बेरोज़गार किया,
*क्या लगी श्रमिकों की हाय सुनो....*है प्रलयंकारी
4. ना पारिस्थितिक तंत्र रहा,
ना जीवन कोई स्वतंत्र रहा।
*अंकुर जिसका आहार नियत
*कहता खुद को मांसाहार सुनो....*है प्रलयंंकारी
5. जलमग्न धरा किस हाल में है,
अब धरा मौत के गाल में है।
*जागो मानस के राजहंस
*धरती की करुण पुकार सुनो.... है प्रलयंकारी
व्याख्या :- वर्तमान परिदृश्य में जनमानस के द्वारा धरती और वातावरण का जो दोहन हो रहा है, कहीं कहीं ना कहीं मौन संदेश है हमारी सजगता बढ़ाने के लिए, प्रकृति को बचाने के लिए।
डॉ ओमकार साहू "सर्द"
प्रेमनगरसूरजपुर,छ0ग0
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