जिला- जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़
विधा- पद्य
दीन हूं नहीं कोऊ सरदार ।
करता भक्ति भाव है तेरो छपै नहीं अखबार ।
कहता कोई मूरख है तो कोई ढोर गंवार।
अचरज लागो है बड़ मोही ए देखि देखि संसार।
आस्तिक भयी दुश्मन सारे नास्तिकन भयी यार।
कहैं प्रतापा मरै वै जो चिन्है न मुक्तावन हार।।४।।
मेरो जात चौधरी होऊ।
ना श्रेष्ठतम है ना उधमा मध्यम क्रम में सोऊ।
का हुआ तुम वेदना रूठी कभी न हमी रोऊं।
जात -कुजात न जानव कबहूं ऐसी मोर सुभाऊं।
उजला-मैला पहचाने हौं ता चौधरी कहाऊं।
कहैं प्रताप हमार प्रभु और जन्म इहि पाऊं।।५।।
प्रेमन से मिले प्रभुताई।
माया-वश ही दूर रहा मैं चेतना नहीं आई।
कियो प्रेम था अनन सुकन्या दोऊ-हिया समाई।
ताहि समया मम् हिरदै में आदि शक्ति परछाई।
छोड़ कन्या लगे योग साधे बहु दिन बा प्रभु पाई।
तभी वेदना प्रताप मिले थाल आरती सजाई।।६।।
प्रताप चंद साहू
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