जिला-जांजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़)
विधा-कविता
शीर्षक- सरहदें
जब लोग पार कर जाते हैं हदें-२
उनके बीच बन जाती है नफरत की सरहदें।।
क्यों उठती ये नफरत की दीवार-२
अगर करते हम एक-दूसरे से प्यार।।
आखिर हम भी तो अपने हद में नहीं हैं-२
इसलिए कोई शांति सरहद में नहीं है।।
ना पाक बनता ना बांग्लादेश बनता-२
केवल और केवल भारत देश बनता।।
न होते ये जिन्ना विचार वाले नेता-२
गांधी, सुभाष, टैगोर भारत और देता।।
आज गांव-गांव के बीच नफरतें है-२
शहर-शहर के बीच कटुता है।।
नेता-नेता में मार-काट है-२
जनता-जनता न कोई अछुता है।।
फिर कैसे मिटेगी ये तनाव की सरहदें-२
जब बोझ बनकर एक दूसरे पर लदें।।
इसके लिए मर्यादा और सहयोग की नैया में लगें_२
खत्म हो जायेगी ये नफरत की सरहदे
नफरत की सरहदें।।
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