जिला-जांजगीर(छत्तीसगढ़)
विधा-कविता
प्यारा चन्द्रमा
सूरज यूं ही धीरे-धीरे डूबता रहा।
चन्द्रमा भी धीरे-धीरे उगता रहा।।
भूल हुआ उसे अभी भोर की अंधेरा।
मैं जाऊंगी तो शाम होगी या सबेरा।।
इस भ्रम डूबकर मैं लास हो गई थी।
इधर या उधर हाय!हताश हो गई थी।।
डाल पर चिड़िया चहचहाने लगे थे।
एक दो लोग आने जाने लगे थे।।
खड़ी रही मैं निर्जीव स्तंभ सा।
शायद किसी के आने में विलंब था।।
बेसुध -ब्याकुल मैं बड़ी बेचैन थी।
असकों की धारों से गिली मेरी नैन थी।।
तभी खत्म हुआ इंतजार की घड़ियां।
उदित हुआ मेरा प्यारा चन्द्रमा।।
दुर हुआ चूभन जो दुखता रहा।
सूरज यूं ही धीरे-धीरे डूबता रहा।।
डूबता रहा।।।
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