Wednesday, January 22, 2020

राजस्थान से बजरंग लाल सैनी *वज्रघन* की रचना- तिरंगे का दर्द

बजरंग लाल सैनी *वज्रघन*
राज्य - राजस्थान
संपर्क ८७६९७६४७८६

शीर्षक - - *तिरंगे का दर्द*



*तिरंगा* प्रतीक स्वाभिमान का है,
शहीदों की शहादत के सम्मान का है।
किंतु आज यह निःशब्द रो रहा है,
होकर भी आजाद, आजादी अपनी खो रहा है।
चक्र अब कुछ ऐसा चला है,
 हरा केसरिया इक दूजे को खला है।
केसरिया देखो लहू से लाल हुआ है,
 श्वेत शांति का काल हुआ है।
हरा है नित धमाल करता,
नीला भी नहीं कम कमाल करता।
सब के सब स्वार्थ में जुट गए हैं, एकता अखंडता के सब भाव छुट गए हैं।
सड़कें नित लाल हो रही हैं, अगणित माँ अपने लाल खो रही हैं।
मज़हबों के फसादों से परेशान,
तिरंगा है अपने लोगों से हैरान।
गुम हो गया सर्वधर्म समभाव का नारा,
मजहबी लपटों से झुलसा है भारत सारा।
गांधी के चरखें कहीं जल गए हैं।
पटेल-से पुरखे कहीं चले गए हैं।
सावरकर राजनीति के अखाड़ा बने हैं,
आजादी का श्रेय लेने सब के सब तने हैं।
ओ बिस्मिल! ओ तिलक! तुम वापस आओ,
हम सब एक हैं, इन सबको समझाओ।
*वज्रघन* कवि कहता है तुम सबसे,
तिरंगा प्यारा है मुझको उस रब से।
परस्पर लड़कर यूँ ना शीश कटाओ,
सब मिलकर तिरंगे का मान बढ़ाओ।


बजरंग लाल सैनी *वज्रघन*

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