राज्य- प. बंगाल
शीर्षक-खामोशी
विधा-छंद मुक्त
रस -श्रृंगार
कविता-खामोशी
रात का सन्नाटा
सब तरफ
खामोश ही खामोश
चारों ओर है अंधियाली छायी
रात्रि ने है ।
अपनी खामोशी बिखरायी।।
टिम -टिम करते हैं तारे
चंद्र-किरणें अपनी छटा से
उजियारा बिखरा रही
एक परछाई चली जा रही
है मगर खामोश
कोई चला आ रहा है
वहां से
है मगर खामोश
खामोश निगाहों ने
खामोश निगाहों को देखा
प्रेम है दिलों में
मगर हैं छिपायें
मन्दिर और मस्जिद हैं
आडे़ आये
साहस नहीं कुछ कर जायें
अपने प्यार को
आगे बढ़ायें।।
रहते हैं बस हमेशा
खामोश ही खामोश।।
👌
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