Tuesday, October 13, 2020

दुर्ग से अनुरमा शुक्ला की रचना- सुरक्षित नहीं नीड़

रचनाकार- अनुरमा शुक्ला
स्थान- दुर्ग छ.ग.
विधा- आलेख
विषय- चिड़ियों का घोंसला

शीर्षक- सुरक्षित नहीं नीड़


परिवार के साथ एक ही आशियाने में रहना सुखद एहसास होता है, पक्षी भी कठोर परिश्रम करते हैं अपना नीड़ बनाने के लिये । तिनका-तिनका चुन चुनकर कर लाते हैं अनवरत यह एक सी क्रिया करते रहते हैं संयम के साथ । फिर उसी नीड़ में ये अंडो को सेता है,पक्षियों ने  हमें आशा,परिश्रम और धैर्य सिखाया है ।
पक्षी अक्सर नर और मादा एक साथ चलते हैं मादा जब अंडो को सेने का काम करती है तो नर उसके लिये भोजन की व्यवस्था करता है।

लेकिन जिन चिड़ियों की चहचहाहट कभी कानों में रस घोला करती थी वही अब अल्पसंख्यक होने लगे हैं, मानव से ही ये भय खाने लगे हैं क्योंकि मानव अपनी विलासितापूर्ण जिंदगी के लिये ,घर गंदा ना हो जाये इसलिए इनके घोसलों को नष्ट कर देते हैं, घरेलू गौरैया जो घर में या बाड़ी में घोंसला बनाते थे वो अब नजर ही नहीं आते ।
वनों की अंधाधुंध कटाई और कीटनाशक का प्रयोग भी एक कारण है कि धीरे-धीरे इनकी प्रजाति लुप्त होने के कगार पर है, साँप, कौवे,बिल्ली, बाज भी इन्हें सुरक्षित नहीं रहने देते ।


नेचर फॉरेवर सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद दिलावर के विशेष प्रयासों से वर्ष 2010 में पहली बार 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया गया था,तब से इस दिन विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।

इसी तरह गौरैया के जीवन संकट को देखते हुए वर्ष 2012 में उसे दिल्ली के राज्य पक्षी का दर्जा तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिया था,लेकिन हालत अब भी जस की तस है।
पक्षियों के अस्तित्व को बचाने के लिये हमें प्रयास करना जरुरी है । हम घरों में कृत्रित घोसले बना सकते हैं उनके भोजन की व्यवस्था कर सकते हैं( चावल,पोहा,रोटी इत्यादि)।
अपने अंडे देने के में अगस्त से नवंबर मे ये पक्षी जरुर आयेंगे । हम इन्हें उचित स्थान और सुरक्षा दें तो ये जरुर वापस आयेंगे । 
संरक्षण देने की आवश्यकता है बस।

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