दिल्ली
एक लौ जलानी है
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एक राह दिखानी है
एक लौ जलानी है
ज़िन्दगी की इस मुश्किल घड़ी में
एक आस जगानी है
छूट रही हर साँस में
उम्मीद बनानी है
हर बेसहारा की
अब भूख मिटानी है
हर बुझते दिए को
नव लौ दिखानी है
निराशा की इस घड़ी में
उम्मीद बढ़ानी है
उस लड़ते हुए जाबांज का
ढांढस बढ़ाना है
उस सफ़ेद पोशाक को
नमन करना है
उस हर पथराई आँख में
विशवास जगाना है
हम एक है, एक थे
पैगाम पहुँचाना है
ठान लो की कोई ,निराश न होये
इन्सां हो इन्सां का, एहसास तो होये
बहुत जिया अपने लिए
कुछ दूसरो को दो
मानवता का कर्ज
अब तो उतार दो
जात-धरम की संकीर्णता से
खुद को बचा ले
हर इन्सां, इन्सां है
बस इतना समझ ले
इस मुश्किल घड़ी को भी
हम पार करेंगे
फिर से एक नए
नए हिंदुस्तान का निर्माण करेंगे
होंसले बुलंद है
कोई छू ना पायेगा
फिर से मेरा हिन्दुस्तान
आगे बढ़ता जायेगा
जोगिन्दर कुमार
अच्छी रचना है।
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