राज्य - राजस्थान
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शीर्षक - सोच
विधा - वर्ण पिरामिड
मैं
फल
अपने
फैसलों का,
प्रतिमान हूँ,
अच्छे-बुरे कर्मों का,
वही बन पाया हूँ जो
सोचा विचारा अपने मन में।
ये
बात
उतनी
ही सत्य है
जितना उदित
होता दिवाकर है
उदीचि में गगन के
जो जैसा सोचता है, बनता है।
तू
सोच
वैसा ही
जैसा चाहे
बनना जग में
मंतव्य सही हो तो
बन जाता है मानव
महामानव निर्विवाद।
बजरंग लाल सैनी "वज्रघन"
I appreciate it.really it's a beautiful poem.
ReplyDeleteधन्यवाद जी
ReplyDeleteLazwaab guru
ReplyDeleteGreat
ReplyDeleteNice lines
ReplyDeleteGreat lines
ReplyDeleteआभार सभी साथियों का
ReplyDeleteउत्तम शब्द संयोजन
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