पता-रमतरा गुरूर बालोद( छत्तीसगढ)
शिर्षक- "सुंता के डोरी"
जाना है सबला दुरिहा ,
फेर काबर नई मानस तैहा बहिय्या,
जेला पाय तेला सुनावत हस राम कहानी,
कतिकेच घलो सुते रबे ,होगे हे बिहिनीया ,
लिपाये तुलसी चावँरा घलो लजावत हे ,
रात कुन के बोरे बासी ,
घलो अडबर सुहावत
थे,
फेर का होगे ये परानी मन ला ,
'पीज्जा '(रोटी) के अगोरा म ,
अँगाकर अउ पान रोटी भुलाथे,
कतिकेच ला कहँव गा ,
मोरो आवत होही नँगरिहा ,
दोनो सगरो परानी मिलके,
गाबो ,सुआ, करमा,अउ ददरिया,
यहू सुआ,करमा,ददरिया के ,
अब नइ होवय कोनो सुनईया ,
अब तो आगे लक्ष्यमी डी जे ,
ता कोन होही राउत के देख्खाईया ,
ये फायसन म ,पुरा दुनिया मोहागे ,
तिज के तिहार मे ,ठेठरी खुरमी के रंधईया घलो नंदागे ,
गाँव म सुघ्घर सुंता करके ,
कराथे रामायण अउ गीता,
रात भर अच्छा झुमरथे ,
अउ होथे बिहिनीया जइसे,
त देथे कुकरी बोकरा ल नेवता,
अइसने मे हम ,दुनिया ला का बताबो ,
आवव अइसन मन ला , जड सुध्धा, उखाड फेकथन,
आवव जुर मिल के गोहार लगाबो ,
हमर अंचल ला एक,
नवा पहचान दिलाबो ,
सगरो परानी जुर मील के ,
सुंता के बीडा उठाबो,
नवा जतन ,नवा सुराज ,
दिया जलाबो ,
चंदा सुरूज बनके ,
दुनिया मे अँजोर बिगराबो,
-खुमान सिंह भाट-
Bhot khub mere kavi bhai...behtareen
ReplyDeleteAwesome yaar
ReplyDeleteTussi chha gaye