डॉ पूनम झा
दरभंगा,बिहार
सम्पर्क --
विधा - कविता
शीर्षक --सच्चाई
दरभंगा,बिहार
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विधा - कविता
शीर्षक --सच्चाई
सच्चाई
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ज़िन्दगी एक सच्चाई है,
उसे छिपाओगे कबतक,
ज़ान तो एक दिन जाएगी,
उसे बचाओगे कबतक,
क्या मिलेगा तुमको,
दिल किसी का तोड़ कर,
छीनकर खुशियाँ किसी की
मुस्कुराओगे कबतक,
जरा दिलों अपने झाँककर
तो देखो,घोट कर गला शराफ़त
का सुख पाओगे कबतक,
बेचते हो बेटों को शादी
के नाम पर,
कहो बोली बेटे की यूँ
लगाओगे कबतक,
मिले नोट मुँह माँगे चिहे
लड़की जैसी हो,
हाथों में दुल्हन के यूँ मेंहदी,
लगाओगे कबतक,
लगता है ज़नाजा जा रहा हो
बेज़ान लाश का,
दुल्हन की ऐसु डोलियाँ,
उठाओगे कबतक,
बेटी अभी तुम्हारी भी कंवारी
है याद रहे,
औरों की बेटियाँ को यूँ
रुलाओगे कबतक,
तुम्हारी बेटी को भी
अगर कोई सताने लगे,
जरि सोचो फिर तुम,
आँसू बहाओगे कबतक,
इसलिए करो दहेज से तौबा।
इस आग से आखिर खुद को
बचाओगे कबतक।
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ज़िन्दगी एक सच्चाई है,
उसे छिपाओगे कबतक,
ज़ान तो एक दिन जाएगी,
उसे बचाओगे कबतक,
क्या मिलेगा तुमको,
दिल किसी का तोड़ कर,
छीनकर खुशियाँ किसी की
मुस्कुराओगे कबतक,
जरा दिलों अपने झाँककर
तो देखो,घोट कर गला शराफ़त
का सुख पाओगे कबतक,
बेचते हो बेटों को शादी
के नाम पर,
कहो बोली बेटे की यूँ
लगाओगे कबतक,
मिले नोट मुँह माँगे चिहे
लड़की जैसी हो,
हाथों में दुल्हन के यूँ मेंहदी,
लगाओगे कबतक,
लगता है ज़नाजा जा रहा हो
बेज़ान लाश का,
दुल्हन की ऐसु डोलियाँ,
उठाओगे कबतक,
बेटी अभी तुम्हारी भी कंवारी
है याद रहे,
औरों की बेटियाँ को यूँ
रुलाओगे कबतक,
तुम्हारी बेटी को भी
अगर कोई सताने लगे,
जरि सोचो फिर तुम,
आँसू बहाओगे कबतक,
इसलिए करो दहेज से तौबा।
इस आग से आखिर खुद को
बचाओगे कबतक।
डॉ पूनम झा
दरभंगा, बिहार
दरभंगा, बिहार

दहेज प्रथा के विरोध में समाज को जागरूक करने हेतु कवयित्री पूनम झा जी को अनेकानेक बधाई...🙏💐
ReplyDeleteसार्थक कविता....
ReplyDeleteVery nice
ReplyDeleteबहुत ही अच्छी कविता... पूनम झा जी✍️
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर और सार्थक कविता
ReplyDeleteहृदयस्पर्शी
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteVery nice..
ReplyDeleteGreat poem...👌
ReplyDeleteआखिर कब-तक...?
ReplyDelete👌👌👌👌👌👌👌
Very nice
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