Monday, October 14, 2019

महाराष्ट्र से कवयित्री गार्गी सिंह की रचना- घड़ी औरत


गार्गी सिंह
घड़ी औरत
महाराष्ट्र



अपनी पहचान कमाने
घर से निकलती वो
'मैं भी कर सकती हूँ'
हर वक़्त सोचती वो
कभी घर, कभी ऑफ़िस
घड़ी की सूईयों पर टिकी वो
अपने सपनों की कसौटी पर
चकरगिन्नी सी घूमती वो
उसमें भी जज़्बात हैं
कह जाती अनकही वो
तेज़... और तेज़ बढ़ती
मुंबई लोकल सी दौड़ती वो
अपनों की ख़ातिर हरदम
अपनी ख़ुशियाँ समेटती वो
ओ स्त्री! तू प्रेरणा है!
सुनकर, बस मुस्कराती वो!
गार्गी सिंह

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