ब्लॉक--आरंग
जिला --रायपुर
राज्य --छत्तीसगढ़
विषय- कविता
शीर्षक- *काले मेघा अब तो बरसों न*
विधा--छंदमुक्त
मो.-९७५३१६४८८५
दिनांक-१४जून
*बरसात*
"काले मेघा अब तो बरसों ना"
काले मेघा अब तो बरसों ना,
ऊष्मता को शीतलता दे दो ना,
अब तो क्षितिज में छा जाओ ना,
धरा को अब तो ठण्डता दिलाओ ना।।१।।
आषाढ़ में तो बरसते थे ना,
अब क्यों नहीं बरस रहे हो ना,
राह देख रहे अन्नदाता आ जाओ ना,
खलिहान का पिपासा अब तो बुझाओ ना।।२।।
धरती के बनराई रोदन कर रहे है ना,
पशु-पक्षी भी कलरव कर रहे है ना,
तृप्ति इनकी न तो बुझ रही है ना,
उम्मीद अभी भी आपसे बनी है ना।।३।।
तड़पन प्राणियों को तृप्ति तो दो ना,
आशा को निराशा अब तो न दो ना,
निश्चल होकर अब मेघा जल्दी बरसों ना,
हम सब पर अब तो मेहरबानी करो ना।।४।।
उष्णता से सभी को शीतलता दो ना,
सावन भी आ रहा अब तो पानी दो ना,
जगत थर्रा रहा कुछ तो अब राहत दो ना,
ताक रहा राह आपका अब तो राह भटको ना।।५।।
मेघा ओ मेघा अब तो आ जाओ ना,
हम सभी जीवों को इतना अब छलों ना,
आप के स्वागत में हम टकटकी लगाये है ना,
चाहता है प्राणी जगत मेघा जोरों से बरसों ना।।६।।
मेघा हरमन की तृप्ति बुझाओ ना,
हरमन को अब तो न तड़पाओ ना,
निहार रहा है राह सभी नजर हरमन ना,
अब अपना आशीष तो सब पर बरसाओ ना।।७।।
रचनाकार/कलमकार/साहित्यकार
हरमन कुमार बघेल
व्याख्याता
आरंग - रायपुर
छत्तीसगढ़
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