Friday, May 24, 2024

कोरबा से गार्गी चटर्जी "आशा " की रचना- निर्वाण

नाम :- गार्गी चटर्जी "आशा "
जिला :- कोरबा
राज्य :- छत्तीसगढ़
विषय :- बुद्ध पूर्णिमा
शीर्षक :- निर्वाण
विधा :- कविता
मोब नंबर :- 7987994537


हुआ था जनम नेपाल , पवित्र लुंबिनी जहांँ ।
करे दर्शन भरे भाव , भगत सारे वहांँ ।।

बना था महल तो तीन , विलास भोग के लिए ।
मनोरंजन सभी त्याग , कुंँवर राजा किए ।।

मिला था अतुल आराम , तजे सभी अगाधता ।
यही चाह कि मिटा , गहन अज्ञानता ।।

पड़े थे निकल वो संत , घिरी बड़ी निशा घनी ।
रही खोज बस एकांत , मन तपस्या तनी ।।

लिए थे कठिन सन्यास , बड़ी हठी उपासना ।
किए प्राप्त तब निर्वाण , परम आराधना ।।

जरा ब्याधि तन की मृत्यु , मिली अतृप्त ज्ञान वो ।
महाबोध तरु के छांँव , जब किए ध्यान तो ।।

नहीं देख सकते बुद्ध , किसी मनुष्य को दुखी ।
सदा एक बस थी चाह , जन सभी हों सुखी ।।

दिखाए सकल को राह , प्रचार  खूब थे किए ।
अहिंसा परम है धर्म , जगत सीखा गए ।।

  गार्गी चटर्जी "आशा " 
  कोरबा (छत्तीसगढ़)

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