राज्य-छत्तीसगढ़
जिला-कोरबा
विधा- काव्य
विषय -"टुरा बिगड़ गेहे रे..."
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दाई- दादा के बात नई माने,मनमानी अपन करथे रे।
जेती जाबे तेती कहत सुनबे , टुरा बिगड़ गेहे रे ।।2।।
नान-नान लोग-लइकामन , गुटखा बिड़ी सिगरेट फूकत हे रे।
एक-दूसर के देखा-देखी,दारू-गांजा घलव पियत हे रे।।
पढ़ाई-लिखाई ल छोड़के,गली-गली किंजरत हे रे।
थोरकुन सोचव घलव जी,काबर टुरा बिगड़ गेहे रे।।2।।
गाड़ा-गाड़ा पइसा देके,चिरहा-फटहा पैंट लेवत हे रे।
चुंदी फकवाए जाथे आऊ , कुकुरा-चुन्दा मुड़ी हलावत आथे रे।।
रंग-रंग के जिनिस खाथे, घूमे-फिरे बर पइसा माँगथे रे।
नई देबे त आँखी देखाथे, कइसे टुरा बिगड़ गेहे रे।।2।।
रात भर टुरा मोबाइल कोचकथे , बिहनिया लात तान के सुतथे रे।
पबजी खेलथे धन कोनो ल गोठियाथे , कोन जानी टुरा ल का होगे रे।।
दुनिया के चकाचौंध म आगू आ गयन,आऊ संस्कृति ल भूला गयन रे।
दाई-बबा के कथा-कहानी,आऊ संस्कार हर बिसरागे रे।।
इखरे खातिर रे संगी,टुरा बिगड़ गेहे रे।।2।।
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कृष्णा देवी कारकेल
डीएम.- 89 ओमपुर रजगामार, जिला-कोरबा (छत्तीसगढ़)
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