जिला - बलौदाबाजार
राज्य -छतीसगढ़
विषय -विरह
शीर्षक -मेरी सरिता
विधा -गीत
सम्पर्क दुरपा रोड कोरबा नगर
मेरी सरिता
होके व्यथित अति रत्नाकर बोल पड़ा -"मेरी सरिता
अब बांहोँ में जल्दी आओ कल नहीं मुझको मिलता
कितनी नदिया आके समायीं इन प्यासी बांहोँ में
मिटी तब भी बेचैनी न फर्क पड़ा आंहों में
बहता जैसा प्रेम है तुझसे बस तुझसे ही बहता
अब..
श्राप मिला है जन्मों जनम से उसको ढोये जाता
हर कोई मुझको अपना लगता हृदय में सबको बसाता
पर अहम स्थान तूँ रखती क्या?सबसे तेरी समता
अब..
जगतनियंता से विनती मैं करता न रोड़ेँ मग हों
तुमको पहुंचने मंजिल तक हर कोई सज्ज सजग हों
नाम वहीं से मुझे बताना यदि कोई भाव ये रखता
अब..
बेकलता मेरी लख करके धरा गगन ये काँपे
जीव जगत मम क्रँदन सुनके निज निज कर्ण को ढाँपे
कैसे ये सम्भव होगा तेरा व्याकुल मन न सुनता "
अब..
©®कवि प्रभात
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