Sunday, January 15, 2023

महासमुंद से विनोद कुमार चौहान'जोगी' की रचना- सुन रहा है बिनोद

कवि :- विनोद कुमार चौहान "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
राज्य :- छत्तीसगढ़ 
विधा :- मुक्त
विषय :- मकर संक्रांति
शीर्षक :- सुन रहा है बिनोद

सुन रहा है बिनोद,
बस इक रंगीन पंतग सी तो होती है,
ये ज़िन्दगी हमारी।
ज़िद आसमान छूने की होती है,
कश्मकश ज़मीन से जुड़े रहने की भी होती है।

सुन रहा है बिनोद,
जीवन में संतुलन वहीं बनाए रख पाता है,
जो नियमों के मांझे से बंधा होता है।
जो इस नाज़ुक बंधन को तोड़ चलता है,
वह राह भटक जाता है, और गिर जाता है।

सुन रहा है बिनोद,
ये ज़िन्दगी की रुख भी, 
हवाओं की दिशा पर निर्भर होती है।
स्वावलंबी जितनी मर्जी हो बन जाए,
मगर जीवन के थपेड़ो से प्रभावित होती है।

सुन रहा है बिनोद,
सूरज की तरह ही होता है जीवन में,
सुख और दुख का उत्तरायण-दक्षिणायण।
समय के साथ हर परिस्थिति,
अपनी करवटें बदल लेती है।

सुन रहा है बिनोद,
जीवन में जो खुशियां हैं,
वो तिल के लड्डू से मिठे होते हैं।
जिनका स्वाद हमें सदैव ही,
अपनों के साथ बांट कर लेना चाहिए।

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