Sunday, January 15, 2023

छत्तीसगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंंजारीवाले' की रचना- पुण्य पर्व मकर संक्रांति

---<<००: पुण्य पर्व मकरसंक्रान्ति :००>>---
                     { दोहा छन्द }
                     ०××××××०
उत्तर  को   सू्रज   चले , दक्षिण को है त्याग ।
जाते   क्रमशः  भानु  हैं , उत्तर  पथ  अनुराग ।।१।।
पथ  परिवर्तन  कर  रहे , छायापति दिननाथ ।
जग को प्रकाश सदा दे , अनवरत  एक साथ ।।२।।
छोड़ चले धनु राशि को , आगे    धरते   पाँव ।
राशि मकर  तक  पहुँचे , बदल दिया  है ठाँव ।।३।।
प्रारंभ शिशिर ऋतु रहा , आज  वार से  जान ।
श्रद्धा   से   पूजन   करें , होता  कष्ट   निदान ।।४।।
संक्रांति  यह  मकर की , कहते  जग के लोग ।
तीर्थों  में  स्नान   करते , पुण्य   बहुत  संयोग ।।५।।
देते  रवि  को  अर्घ्य  है , करते   हैं   जलदान ।
कहते भास्कर  रश्मि से , जीते  जीव   जहान ।।६।।
करते   दर्शन  तीर्थ  का , लेके  कुटुम्ब - मित्र ।
तीर्थों  का  दर्शन  किये , होता   हृदय  पवित्र ।।७।।
तिल का  करें  प्रयोग है , मानव   षष्ठ  प्रकार ।
करते  हैं  दान तिल का , मन  में  हर्ष  अपार ।।८।।
तिल का है उबटन लगा , करते   देह  विशुद्ध ।
तिलजल से है स्नान भी , करते  लोग  प्रबुद्ध ।।९।।
भक्षण तिल का भी करें , जो मनुज जानकार ।
करते पान तिलजल का , लेते  जीवन  उद्धार ।।१०।।
तिल का है हवन करके , लेते    पुण्य    बटोर ।
बाँटे   कम्बल   वस्त्र  है , बाढ़े सुख  चहुँ ओर ।।११।।
खाते कुछ वनभोज भी , खेलें    कई     पतंग ।
कह 'ठाकुर'संक्रांति यह , दिल  में   भरे  उमंग ।।१२।।
                     ०××××××०
दि.१४.०१.२३--जगतसिंह ठाकुर 'बंंजारीवाले'
                   ९४०६०५७७६३ , ६२६६५२४२६१

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