---<<००: पुण्य पर्व मकरसंक्रान्ति :००>>---
{ दोहा छन्द }
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उत्तर को सू्रज चले , दक्षिण को है त्याग ।
जाते क्रमशः भानु हैं , उत्तर पथ अनुराग ।।१।।
पथ परिवर्तन कर रहे , छायापति दिननाथ ।
जग को प्रकाश सदा दे , अनवरत एक साथ ।।२।।
छोड़ चले धनु राशि को , आगे धरते पाँव ।
राशि मकर तक पहुँचे , बदल दिया है ठाँव ।।३।।
प्रारंभ शिशिर ऋतु रहा , आज वार से जान ।
श्रद्धा से पूजन करें , होता कष्ट निदान ।।४।।
संक्रांति यह मकर की , कहते जग के लोग ।
तीर्थों में स्नान करते , पुण्य बहुत संयोग ।।५।।
देते रवि को अर्घ्य है , करते हैं जलदान ।
कहते भास्कर रश्मि से , जीते जीव जहान ।।६।।
करते दर्शन तीर्थ का , लेके कुटुम्ब - मित्र ।
तीर्थों का दर्शन किये , होता हृदय पवित्र ।।७।।
तिल का करें प्रयोग है , मानव षष्ठ प्रकार ।
करते हैं दान तिल का , मन में हर्ष अपार ।।८।।
तिल का है उबटन लगा , करते देह विशुद्ध ।
तिलजल से है स्नान भी , करते लोग प्रबुद्ध ।।९।।
भक्षण तिल का भी करें , जो मनुज जानकार ।
करते पान तिलजल का , लेते जीवन उद्धार ।।१०।।
तिल का है हवन करके , लेते पुण्य बटोर ।
बाँटे कम्बल वस्त्र है , बाढ़े सुख चहुँ ओर ।।११।।
खाते कुछ वनभोज भी , खेलें कई पतंग ।
कह 'ठाकुर'संक्रांति यह , दिल में भरे उमंग ।।१२।।
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दि.१४.०१.२३--जगतसिंह ठाकुर 'बंंजारीवाले'
९४०६०५७७६३ , ६२६६५२४२६१
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