कवि :- विनोद कुमार चौहान "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
राज्य :- छत्तीसगढ़
विषय :- सौंदर्य
विधा :- कविता
शीर्षक :- सौंदर्य की परिभाषा
जीवन के इस सफर में,
विचारों के महा समर में,
रह-रह उठता बस एक ही सवाल।
आखिर सौंदर्य की परिभाषा क्या है?
नैन नक्श का नक्काशीदार होना?
शारीरिक रंगों से अंगों का श्रृंगार होना?
या कि कद-काठी, डील-डौल से,
हर पैमाने में उन्नीस पर बीस होना?
गेसुओं का घटाओं सा घना होना?
कमर पतली, गले का सुराही सा तना होना?
क्या कोकिला से कंठ में छुपी है सौंदर्यता?
या दंत श्रृंखला की जमावट में दिखे है सौंदर्यता।
विदूषियों के मतानुसार देखें तो,
मदद को बढ़ते हाथों में,
शहद सी मृदुल बातों में,
निश्छल निर्मल विचारों में,
प्रेम, अपनत्व, भाईचारा में,
दया, ममता, नि: स्वार्थ विचार धारा में,
छुपी हुई है असली परिभाषा,
जीवन की, जीवन के सौंदर्य की।
No comments:
Post a Comment