नाम- पुखराज प्राज
जिला- गरियाबंद (छत्तीसगढ़)
विधा- लेख
शीर्षक- ऊर्जा संरक्षण में निहित है मनुष्यता का कल
(अभिव्यक्ति)
ऊर्जा के उपभोग की प्राथमिक प्रायोगिकता को सार्थकता का रूप उस महामानव ने दिया; जिन्होंने आग की खोज आदिमकाल में की। आग की खोज ने मानव सभ्यता में विभिन्न परिवर्तन ला खड़ा किया। आग यानी ऊष्मा या ताप के इर्दगिर्द कई उपक्रमों के प्रारंभिक ताने बाने बुने गए। कई प्रायोगिक शोधों ने मनुष्य को आदिम से सभ्य बनने की सीढ़ी में प्रगाढ़ योगदान दिया। आग के इर्दगिर्द कई खेलों के रूपांतरण और नाटकीय ढ़ंग से आग के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के स्वरूप और स्वभाव में परिवर्तन देखने को मिला।जैसे लौह अयस्क हल्के और पत्थरों के बीच भंगुरता ग्राही स्थिति में रहते हैं।लेकिन आग के तपन में अयस्क शुद्धता की चादर ओढ़कर कठोर बन जाता है। सारांश में कहें तो ऊर्जा का मनुष्य के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। अब बात अभिन्नता की है तो संरक्षण भी लाजमी है। वैज्ञानिक ऊर्जा को कार्य करने की क्षमता के रूप में परिभाषित करते हैं। आधुनिक सभ्यता इसलिए संभव है क्योंकि लोगों ने सीखा है कि ऊर्जा को एक रूप से दूसरे रूप में कैसे बदला जाए और फिर उसका इस्तेमाल काम करने के लिए किया जाए। इसी परिप्रेक्ष्य में ऋग्वेद की एक ऋजा कहती है कि-
भराय सु भरत भागमृत्वियं प्र वायवे शुचिपे क्रन्ददिष्टये ।
गौरस्य यः पयसः पीतिमानश आ सर्वतातिमदितिं वृणीमहे ॥
अर्थात्, परमात्मा पोषणकर्त्ता यानी ऊष्मा प्रदान करने वाले ज्ञानरस का पिलाने वाला जीवनप्रद है।जो उपासक स्तुति में रत है यानी प्रकृति के संतुलन को यथासंभव समझते हुए उपभोगी है। यथासमय उपासना करता है, उसके उपासनारस को स्वीकार करता है, उस जगद्विस्तारक अविनाशी का मानना उसकी स्तुति करना अवश्य चाहिए। प्रकृति में ऊष्मा या ऊर्जा का सबसे बड़ा स्त्रोत सूर्य है।जिसकी ताप से पृथ्वी पर विभिन्न भौगोलिक-पारिस्थितिक परिवर्तन संभव है। इसी संकल्पना को और विस्तृत रूप से समझते हुए आइन्सटाइन ने कहा, द्रव्यमान-ऊर्जा तुल्यता प्रणाली के स्थिर ढांचे में द्रव्यमान और ऊर्जा के बीच का संबंध है, जहां दो मान केवल एक स्थिरांक और माप की इकाइयों से भिन्न होते हैं। सिद्धांत का वर्णन भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन के प्रसिद्ध सूत्र द्वारा किया गया है: ई के बराबर एम सी का वर्गमूल है। सूत्र एक कण की ऊर्जा यानी प्रतिक चिन्ह ई को उसके बाकी फ्रेम में द्रव्यमान एम के उत्पाद के रूप में प्रकाश वर्ग सी का वर्गमूल की गति के साथ परिभाषित करता है। ऊर्जा की मात्रा, जो पदार्थ की संरचना से स्वतंत्र है। रेस्ट मास, जिसे अपरिवर्तनीय द्रव्यमान भी कहा जाता है। एक मौलिक भौतिक संपत्ति है जो गति से स्वतंत्र है। यहां तक कि प्रकाश की गति के निकट अत्यधिक गति पर भी संभावित है। संदर्भ के सभी जड़त्वीय फ्रेम में इसका मान समान होता है। फोटॉन जैसे द्रव्यमान रहित कणों का शून्य अपरिवर्तनीय द्रव्यमान होता है, लेकिन द्रव्यमान मुक्त कणों में संवेग और ऊर्जा दोनों होते हैं। ऊर्जा को समझने के पश्चात् ऊर्जा के संरक्षण के परिणामस्वरूप कम रहने वाले खर्च होते हैं क्योंकि ऊर्जा की बचत से मौद्रिक बचत होती है। उपभोक्ताओं को अपनी जेब में अधिक नकदी रखने में मदद करने के साथ-साथ यह पर्यावरण को अतिरिक्त संसाधनों के उपयोग और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से बचाने में भी मदद करता है। ऊर्जा के संरक्षण का नियम कहता है कि, ऊर्जा को न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। बल्कि इसे केवल एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। ऊर्जा के संरक्षण के नियम के अनुसार, एक पृथक प्रणाली की कुल ऊर्जा समय के साथ संरक्षित रहती है। ऊर्जा के सभी रूप ऊर्जा के संरक्षण के नियम का पालन करते हैं। रूपांतरण से पहले और बाद में कुल ऊर्जा स्थिर रहती है। ऊर्जा संरक्षण कम ऊर्जा का उपयोग करने का निर्णय और अभ्यास है। जब आप कमरे से बाहर निकलते हैं तो प्रकाश बंद कर देते हैं। उपकरणों का प्लग निकाल देते हैं जब उपयोग में नहीं होते हैं और ड्राइविंग के बजाय चलना ये सभी ऊर्जा संरक्षण के उदाहरण हैं। हमारे यानी मानव-संचालित पारिस्थितिक संकट के अंतर्जात आधार को संबोधित करता है। यह सामाजिक और व्यक्तिगत स्तरों पर इसके कारणों को दर्शाता है: ऊर्जा से संबंधित हमारे अपने तरीके के परिणाम के रूप में हमारे वर्तमान पारिस्थितिक संकट का विश्लेषण किया जाता है।
प्रारंभिक स्तर पर मनुष्य के द्वारा प्रकृति पर अतिक्रमण या दोहन एक प्रकार से प्राकृतिक संसाधनों के अवस्थिति में आमूलचूल परिवर्तन थे। जो एक समय के साथ पूनः चक्रित हो जाते थे। लेकिन बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिक के उत्थान में प्रकृति के अवयवों से ऐसे छेड़छाड़ होने लगे जो प्रतिकूल अवस्थाओं के जन्म का कारण है। वर्तमान परम्परागत् ऊर्जा संसाधनों का ह्रास और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग का संकट भावी कल के भयावह स्थिति को जन्म देने वाला है। मनुष्यों को यह समझना आवश्यक है की हम भी प्रकृति के पारिस्थितिकी का एक हिस्सा हैं ना की स्वामित्व के अधिकारी है। वर्ना प्रकृति अपनी एक समय तक प्रकृति के असंतुलित अवस्था को बर्दास्त करेगी, फिर संतुलन के लिए बड़े विनाश के साथ शून्यता ग्राही होने के लिए क्षणिक देर नहीं करेगी। ऊर्जा के विलुप्त होते संसाधनों के बीच सौर एनर्जी की ओर बढ़ते कदम शुद्ध और स्वच्छ ऊर्जा के प्रदर्शक हैं। शेष ऊर्जा का संरक्षण हमें मिलकर करना होगा।
लेखक
पुखराज प्राज
छत्तीसगढ़
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