Monday, December 12, 2022

कोरबा से गोमती सिंह की रचना- धूप तेरे कितने रूप

कवयित्री-गोमती सिंह 
जिला-कोरबा 
राज्य-छत्तीसगढ़ 
विषय-धूप 
विधा-छंद मुक्त कविता 
शीर्षक-"धूप तेरे कितने रूप "
संपर्क नंबर-8103564763

--पंछी चहके, फूल महके,
चूड़ियों में खनक आ जाती है ,

जब सर्दी के मौसम में धूप सुनहरी आती है। 

धरा गुनगुनाने लगती हौले हौले बसंत को बुलाती 
जब धूप सुनहरी आती है। 

फिर आता मौसम पतझड़ का ,
बसंत छूमंतर हो जाता है। 

कुसुम को ढूंढते भौंरे आते , बागों में देख तपन धूप की 
फिरते मारे मारे ।

पूछें कामगारों से धूप ग्रीष्म की कैसी होती है!!!

रक्त पसीना बन बहते हैं , ललाट में बल पड़ जाते हैं। 
जब धूप ग्रीष्म की आती है ।

रामजी की लीला एक जैसी कहाँ होती है !!!

कभी धूप तो कभी छांव में बदलती है। 

ग्रीष्म की तपन ही तो घनघोर घटा ले आती है । 

पुनः लहराती वसुंधरा, नदी ताल भर जाते हैं। 
काशी फूले कपसा फूले धरती हर्षित हो जाती है। 

     ।।इति।।
   -गोमती सिंह 
कोरबा,छत्तीसगढ़

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