कवयित्री-गोमती सिंह
जिला-कोरबा
राज्य-छत्तीसगढ़
विषय-धूप
विधा-छंद मुक्त कविता
शीर्षक-"धूप तेरे कितने रूप "
संपर्क नंबर-8103564763
--पंछी चहके, फूल महके,
चूड़ियों में खनक आ जाती है ,
जब सर्दी के मौसम में धूप सुनहरी आती है।
धरा गुनगुनाने लगती हौले हौले बसंत को बुलाती
जब धूप सुनहरी आती है।
फिर आता मौसम पतझड़ का ,
बसंत छूमंतर हो जाता है।
कुसुम को ढूंढते भौंरे आते , बागों में देख तपन धूप की
फिरते मारे मारे ।
पूछें कामगारों से धूप ग्रीष्म की कैसी होती है!!!
रक्त पसीना बन बहते हैं , ललाट में बल पड़ जाते हैं।
जब धूप ग्रीष्म की आती है ।
रामजी की लीला एक जैसी कहाँ होती है !!!
कभी धूप तो कभी छांव में बदलती है।
ग्रीष्म की तपन ही तो घनघोर घटा ले आती है ।
पुनः लहराती वसुंधरा, नदी ताल भर जाते हैं।
काशी फूले कपसा फूले धरती हर्षित हो जाती है।
।।इति।।
-गोमती सिंह
कोरबा,छत्तीसगढ़
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