रचनाकार-गोमती सिंह
जिला-कोरबा
राज्य-छत्तीसगढ़
विषय-आग
विधा-छंदमुक्त कविता
शीर्षक-"आग के रूप अनेक "
संपर्क नंबर-8103564763
हे अग्नि देवता! करूँ मैं तेरा वंदन!
तेरे कितने रूप हैं करूँ कैसे इसका वर्णन।
पंचतत्व से बने मानव तन में
एक तत्व है आग भी होता ।
देहरी पर दीप तुमसे है जलता
श्री हरि के मंदिर में पूजन होता
हवन कुण्ड में प्रज्वलित होने से ,
वायुमंडल को शुद्ध है करता ।
भोजन बनता पोषण पाता ,
मानव जीवन का तुमसे गहरा नाता।
जठराग्नि प्रज्वलित न होंने से,
मनुष्य का शरीर रुग्ण हो जाता।
देह त्याग करती जब आत्मा,
आग ही उसे सद्गति है देता ।
।।इति।।
-गोमती सिंह
कोरबा,छत्तीसगढ़
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