शीर्षक - आहट नहीं आगाज ।
विधा- गजल
नाम - रोजी डड़सेना
पता - दुन्गुरिपाली , सोनपुर, ओड़िशा.
पतझड़ के सूखे पत्तों में, ये कैसी सरसराहट है?
लगता है बाघ ए जिंदगी में, किसी नए ख्वाब की आहट है ।
कटीली क्यारियों के झुरमुट से, हवाई पैगाम लाती है ।
नुकीली कांटो मैं महीनों बाद , किसी गुलाब की आहट है ।
जिंदगी गुजर गई, कोरे पन्ने जुड़ते जुड़ते
एहसासों की खनक से आज, मुकम्मल किताब की आहट है ।
मुद्दत से वीराने में, चीखते थे कुछ सवाल ।
फिजाओं में आज उनके जवाब की आहट है ।
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गाड़ी अंधेरी लंबी रात के बाद,
ये केसरिया नूर आफताब की आहट है ।
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