लेखिका -उर्मिला सिदार
जिला -रायगढ़
राज्य -छत्तीसगढ़
विधा -गद्य
शीर्षक- ओस
संपर्क- 930 32 98 994
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ओस जल की बूंदे हैं ,जो वायुमंडलीय दशा की वातावरण से रात्रि काल में बनता है और शीत ऋतु में वाष्प संघनन क्रिया से वाष्प में जल की सिकर निश्चित ठंड पर संघनित होकर बूंदों में बदल जाता है। यही ओस कहलाता है । सूर्य उदय होने के कुछ समय बाद सूर्यताप से गर्मी पाकर ओस वाष्पित्त हो जाता है। ओस की बूंदे प्रातः काल वृक्षों के पत्तों पर, घासों पर ओस स्वरूप में पत्तों के शीर्षो पर चमकते हुए दिखाई देते हैं। पत्तों के शीर्श पर लटकी ओस की बूंदे जब सूर्य की किरणें उस पर पड़ती है ,तो उसका स्वरूप मोती जैसे चमकता हुआ प्रतीत होता है ।उसकी सुन्दरता देखते ही बनता है। मानो हरी चादर में मोती बिछा हुआ खूबसूरत नजारा मन को मोह लेता है। उस दृश्य को देख कर मन प्रफुल्लित हो जाता है ।ओस बहुत लाभकारी भी है। खुला पैर ओस में चलने से पैर के सूजन की समस्या ठीक हो जाती है एवं ठंड मेंओठ फटता है ,तोओस की बूंदों में मक्खन और शहद मिलाकर लेप लगाने से ओठ का फटना ठीक हो जाता है। इस तरह देखते हैं, कि ओस मन और तन दोनों के लिए लाभकारी है। मन खुश और तन स्वस्थ होने से मनुष्य प्रफुल्लित रहता है।
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उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़
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