कवि :- विनोद कुमार चौहान "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
राज्य :- छत्तीसगढ़
विषय :- ओस
विधा :- कविता
शीर्षक :- ओस की बूँदें
संपर्क :- 9669360722
सुना है मोतियाँ मिलती है,
समंदर की गहराइयों में।
मगर शरद ऋतु आते ही,
मानो फलती है धान की बालियों में।
चमक बिखेरती बगानों में,
फूलों की नाज़ुक पंखुड़ियों में।
सुबह-सुबह बिखरी हुई मिलती हैं,
घास की नोक पर, मकड़ी की जालियों में।
चमकती है पाकर किरणों का साथ,
पत्तों के झुरमुट में, झूमती डालियों में।
देख कर इस मनोहर दृश्य को,
बाल मन झूमता है तालियों में।
फिर हौले से छुप जाती हैं,
किसी गुमनाम अटारियो में।
देख कर सूरज को शर्माती हैं शायद,
और शून्य हो जाती है गलियों में।
मगर ये मोती सरीखे ओस की बूँदें,
सबके हृदय में घर कर लेती है सर्दियों में।
No comments:
Post a Comment