कवि -- चेतन सिंह
*पता - कसडोल , बलौदाबाजार
राज्य* - छत्तीसगढ़
विषय - परछाई
शीर्षक - मैं और मेरी परछाई
संपर्क -- 9202507146
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साथ - साथ वो मेरे घर से बाहर निकलती है !
कदम - से - कदम मिलाकर वो संग चलती है !
जब अंधेरा हो , तो वो गुम - सी हो जाती है ;
मुझमें जीती , मुझमें मरती , मुझी में पलती है !
अंधेरा न उसको भाता कोई !
उजालों से उसका है नाता कोई !
शायद है अमरता का वरदान उसे ,
अस्त्र न उसको मार पाता कोई !
कभी चींटी सी, कभी खंभे सी वो रूप बदलती है !
मुझमें जीती ..............................................
न बर्फ में वो पिघलती है !
न आग में वो जलती है !
तूफानों से न डर उसको ,
लहरों में वो टहलती है !
कूदती - फुदकती रहती , वो हर पल मचलती है !
मुझमें जीती ..............................................
हम दोनों दो जिस्म एक जां बराबर !
मेरा तन ही है उसका अपना घर !
मुझसे बिछड़ कर वो रह न पाए ,
वो मेरी परछाई , वो मेरा हमसफ़र !
सूर्य संग उदय उसका , सूर्य संग ही ढलती है !
मुझमें जीती..............................................
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