लेखिका -उर्मिला सिदार
जिला -रायगढ़
राज्य- छत्तीसगढ़
विधा- गद्य
शीर्षक- परछाई
संपर्क -930 32 98 994
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परछाई वह वस्तु या वास्तविकता है। जो प्रकाश किसी जड़ वस्तु के आर पार नहीं जाता है और उस वस्तु के पीछे की पृष्ठभूमि पर प्रकाश न जाने से उसका छाया बनता है ।उसी छाया को परछाई कहा जाता है। परछाई प्रकाश में ही बनता है। अंधेरे में वस्तु की छाया अर्थात परछाई नहीं बनता। अंधेरे में वस्तु नहीं दिखाई देता है। न परछाई बनता है। प्रकाश में वस्तु का आधा भाग दिखता है। आधा भाग समझ में आता है तथा वस्तु की परछाई बनता है ।पृथ्वी की छाया या परछाई को रात के नाम से जानते हैं। मूलतः देखा जाए तो रात पृथ्वी की परछाई है। परछाई अस्तित्व में व्यवस्था के अर्थ में है ,जो भाग प्रकाश की ओर होता है ,वह भाग प्रकाशित और तापित या गर्म होता है। तथा जो भाग प्रकार विहीन होता है। वह भाग प्रकाशित भाग की तुलना में ठंड और अंधेरा होता है ।यह सभी घटनाएं व्यवस्था के अर्थ में स्वयं स्फूर्त विधि से नित्य वर्तमान घटित हो रहा है। अंत में यही कहते बनता है, परछाई अस्तित्व की व्यवस्था के अर्थ में पहचाना जाता है। जैसे प्रकाश वाला भाग धरती पर दिन एवं अंधकार या परछाई वाला भाग पृथ्वी पर रात कहलाता है ।पृथ्वी की व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिन-रात का होना अनिवार्य आवश्यकता है।दिन रात का होना नियमतः प्राकृतिक घटना है।
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उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़
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