Sunday, November 6, 2022

महासमुंद से विनोद कुमार'जोगी' की कृत आलेख- माँ तो आखिर माँ होती है।

कवि :- विनोद कुमार चौहान "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
राज्य :- छत्तीसगढ़
विषय :- माँ
विधा :- लघुकथा
शीर्षक :- माँ तो आखिर माँ होती है।
संपर्क :- 9669360722

मोहित माँ के ऊपर आज फिर बरस रहा था, "कितनी बार कहा है माँ, मेरे चीज़ों को हाथ मत लगाया करो। आॅफिस के इतने सारे जरूरी कागजात रखे होते हैं मेरे कमरे में, एक भी सामान इधर के उधर हुए तो मुझे नौकरी से हाथ धोनी पड़ेगी।" एक सांस में इतना ज्यादा बोलना बचपन की आदत थी उसकी। माँ शांत खड़ी रही गहरे समंदर की तरह, हां ज़रूर भावनाओं की उफनती लहर उसके अंतर्मन में उमड़ रही होगी जिसकी कुछ छींटे आँखों के रास्ते सिलवटों से भरे गालों पर राह तलाश रही थी। तभी मोहित के पाँच साल का बेटा रुआंसा होते हुए आया और बोला "देखो न पापा दादी मुझे खेलने नहीं दे रही है, आज स्कूल में टीचर ने कागज से हवाई जहाज बनाना सिखाया था, तो बस मैं आपके कमरे की डस्टबिन में पड़ी ये रद्दी कागज से बनाने की प्रेक्टिस कर रहा था। और दादी कहती है ये आपके जरुरी कागजात हैं। अगर ऐसा होता तो आप इसे डस्टबिन में थोड़े ही फेंकते।" 
                 यह बात सुनते ही मोहित के आँखों से सैलाब उमड़ पड़ा मानो उसके बेटे ने उसके अंतर्मन में बने बांध के कपाट को खोल दिया हो। वो माँ से लिपट गया, और मन ही मन अपने संकीर्ण सोच को कोसते हुए बुदबुदा रहा था- "माँ तो आखिर माँ होती है"......

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