रचनाकार- उर्मिला सिदार
जिला- रायगढ़
राज्य- छत्तीसगढ़
शीर्षक -शाकाहार
संपर्क नंबर -930 32 98 994
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शाकाहार का अर्थ है, सात्विक भोजन ,इस भोजन का अर्थ है, वनस्पति भोजन, वनस्पति अर्थात पेड़ पौधों के विभिन्न अंगों से मिलने वाली भोज्य पदार्थ को शाकाहारी भोजन कहा जाता है। मनुष्य की शारीरिक संरचना के आधार पर देखा जाए तो ,मानव की शारीरक संरचना के अनुसार मानव का भोजन शाकाहारी है ।शाकाहारी शरीर के निम्न लक्षण पाए जाते हैं शाकाहारी जीव जंतु का आँत 12 से 15 फीट होता है। वह ओट से पानी पीता है। उनकी आंखों का आकार लंबी होती है ।उनके दाँत धारदार नुकीले नही होते है।उनके खूर एवं पैर नुकीले नाखुन दार नही होते और बहुत सारे शाकाहारी जन्तु का लक्षण है। शाकाहारी जंतु अपनी निश्चित आचरण के अनुसार ही शाकाहारी भोजन करते हैं। यह सर्वाहारी नहीं होते ।इसी वर्ग में मनुष्य भी आता है। लेकिन मनुष्य अज्ञानता वश सर्वाहारी भोजन करता है ।कुछ मनुष्य शाकाहारी और ज्यादा मनुष्य सर्वाहारी भोजन करते हैं ।ऐसा वर्तमान में देखा जा रहा है ।इसके फलन में मानव की प्रवृतियां क्रूर के स्वरूप में देखा जाता है ,जो व्यक्ति क्रूर प्रवृत्ति का होता है। वह दूसरों का शोषण करता है और शोषण करने वाले कोई भी जीव जंतु या मानव सुखी नहीं रहता है। शाकाहारी जंतु अपने निश्चित आचरण के अनुसार अपना भोजन शाकाहारी करता है। और अपने आचरण को प्रमाणित करता है ,लेकिन मनुष्य ज्ञान अवस्था की इकाई होते हुए भी अज्ञानता वश अपनी भोजन को आज तक नहीं पहचान पाया है अर्थात अपने शरीर के लक्षण को आज तक नहीं जान पाया है ,कि वह कौन से वर्ग के अंतर्गत आता है। मांसाहारी या शाकाहारी। इसी अज्ञानता के कारण मानव अपने क्रुर प्रवृत्ति से जीव जंतु का वध करके मांस भक्षण करता है। जिसके फलस्वरूप मानव की जो स्वभाव गति का शरीर होता है। वह आवेश गति में आकर अव्यवस्थित होकर रोग ग्रसित हो जाता है ।जबकि कोई भी जीव जंतु या मानव हो भोजन अपने शरीर की पोषण ,संरक्षण और स्वास्थ्य रहने के लिए करता है। वर्तमान के मनुष्य स्वयं के शरीर की प्रयोजन न समझ पाने के कारण ,अज्ञानता वस मांसाहार कर ,अनेक रोगों से ग्रसित होकर प्रकृति की वातावरण को असंतुलित करने में भागीदारी कर रहा है और प्रकृति दिनो दिन ह्रास की ओर जा रही है। जीव जंतु का वध पेड़- पौधों का विनाशऔर खनिजों का दोहन होने के कारण प्रकृति असंतुलित एवं प्रदूषित हो रही है। जिसका परिणाम हमें अनेक समस्याओं के रूप में देखने के लिए मिल रहा है। सात्विक भोजन से मनुष्य निरोग और स्वस्थ रहता है। और स्वस्थ मानसिकता ही सात्विक भोजन के लिए प्रेरित होता है । जो मानसिकता ज्ञान से प्रेरित होकर शरीर की स्वच्छता पर ध्यान देता है। वही मनुष्य समझदारी के साथ सात्विक भोजन करता हुआ,इस अस्तित्व में भागीदारी करता हुआ अपने दायित्व और कर्तव्य को प्रमाणित करता है। अतः जो मनुष्य सात्विक भोजन करेगा अर्थात शाकाहारी करेगा, उसका शरीर स्वस्थता की ओर और जो मनुष्य मांसाहारी करता है वह रोग ग्रस्त होकर समस्या से ग्रसित हो समस्या की ओर गतित करता है। जबकि कोई भी मनुष्य समस्या से ग्रसित होकर जीना नहीं चाहता। समस्या से निजात पाना चाहता है। मनुष्य समाधानित होकर जीना चाहता है, लेकिन समाधानीत अर्थात समस्या से मुक्ति होकर कैसे जिया जाए, इसकी समझ न होने के कारण मनुष्य दुःखी है।इसीलिए मनुष्य वर्तमान में समस्याओं से घिरा, समस्याओं से निकलने का भरपूर प्रयास कर रहा है। लेकिन सफलता अभी तक नहीं मिल पा रही है ।मानव अभी तक अपने भोजन की पहचान नहीं कर पा रहा है तो, समाधान का रास्ता का पता कहां लगा पाएगा। अतः हर मनुष्य को अपनी समस्या पर चिंतन करने की समीचीन आवश्यकता की जरूरत है। पहले अपने भोजन को पहचाने और अपने शरीर के अनुरूप ही भोजन करें।जिससे उनका मन और तन और वातावरण तीनों शुद्ध रहने से ही मनुष्य सुख शांति से जी पाएगा। यही शाकाहारी भोजन का सार्थकता है,यही प्रयोजन है।
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उर्मिला सिदार बुलाँकी रायगढ़ छत्तीसगढ़
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