कवि :- विनोद कुमार चौहान "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
राज्य :- छत्तीसगढ़
विषय :- पगडंडी
विधा :- कहानी
शीर्षक :- यादों की पगडंडी
संपर्क :- 9669360722
शाम का समय था, जब सूरज वसुधा की ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा था। इस प्रगाढ़ प्रेम को देख कर आकाश शर्मा सा गया था, उसके मुख में लालिमा फैल गई थी। और इस मनोरम दृश्य को निहार रहे थे दो बूढ़े नैनो के जोड़े। वो देख रहे थे कि चिड़ियों का झुंड बड़ी तेजी से अपने आश्रय की ओर बढ़ रहा था। सड़क पर तेजी से चलते वाहन और उनपर बड़ी बैचेनी में बैठे लोग, सब अपने-अपने रैन बसेरे की ओर लौट चले थे। उनको देखकर उन आंखों की बैचेनी और बढ़ गई, वो चाहते थे की एनिकट के फाटक खोल दे, जिससे उनके नैन रूपी नदी का पानी अविरल बह चले। मगर वो भूल गए थे की उसके इंतजार में जाने कितने सावन बीत गए, अभी तो जेठ प्रारंभ हो चुका है। पानी का स्रोत पूरा सूख गया है, फाटक खोलने का भी कोई फायदा नहीं।
इसी उधेड़बुन में उन आंखों के सामने कुछ वर्ष पहले का दृश्य बिल्कुल एक फिल्म की भांति चलायमान हो गया। उनके आंखों का तारा, और बुढ़ापे का एकमात्र सहारा, उनका बेटा उनसे जुदा हो रहा था। बहुत कोशिश किया था दोनों ने की रोक ले उसे, अपने बुढ़ापे का हवाला दिया, पुरखों की खेती का हवाला दिया। मगर बेटे ने एक वाक्य में बस इतना ही कहा "शहर में मैनेजर का पद मिल रहा है, पूरे तीस हजार की नौकरी, और ऐश-ओ-आराम की जिंदगी, इस पिछड़े हुए गांव में क्या रखा है? यहां कोई स्कोप नहीं है। यहां कोई डेवलपमेंट नहीं होगा।" आज भी उसके ये अल्फाज़ कानों में गूंजते रहते हैं जिसे सुनने के बाद इन मायूस आंखों ने आखिरी बार उसे पगडंडी से जाते हुए देखा था। और तब से दरस के लिए तरस रहे हैं। पहले तो वह चिट्ठियां लिखा करता था, मगर लगता है अब डाकिये ने उनके घर के पते को खो दिया है। या शायद उसके तीस हजार चिट्ठी के कागज और कलम खरीदने के लिए कम पड़ रहे हैं।
कई बार उसे लिख भेजा था, "बेटा विकास ने गांव का रस्ता देख लिया है, बड़ी-बड़ी कंपनी यहां भी खुल गई हैं। यहीं कर लो ना नौकरी, गांव में ही रहोगे तो खेतीबाड़ी का काम भी हो जाएगा।" मगर उसने हर बार उन्हें निराश ही किया। आज भी दोनों उस ओर इस उम्मीद के साथ अपलक देखते रहते हैं कि किसी रोज़ शायद उनका बेटा शाम ढले भटके राही सा लौट आएगा अपने नीड़ में।
मगर आज शाम उनके अरमानों पर पानी फिर गया, जिस पगडंडी पर वो अपने बेटे के आने की राह देखते थे उसने आधुनिकता की चपेट में आकर काले कांक्रीट के कोट पहन लिए और पूरी तरह से पाट दिया उनकी उम्मीदों को, उनके बेटे के पदचिन्हों को और पाट दिया उस प्यारी सी *यादों की पगडंडी* को।
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