Monday, November 28, 2022

महासमुंद से विनोद कुमार चौहान'जोगी' की रचना- छत्तीसगढ़ी

कवि :- विनोद कुमार चौहान "जोगी"
जिला :- महासमुन्द
राज्य :- छत्तीसगढ़
विषय :- छत्तीसगढ़ी
शीर्षक :- छत्तीसगढ़ी
संपर्क :- 9669360722

छत्तीसगढ़ी

महतारी के गुरुतुर बोली, हावय जी छत्तीसगढ़ी।
दादी के कत्था अउ लोरी, भावय जी छत्तीसगढ़ी।।
करमा सुआ अउ ददरिया, गावय जी छत्तीसगढ़ी।
मया पीरित के महानदी ला, बोहावय जी छत्तीसगढ़ी।।
सुकमा ले बलरामपुर ला, जोड़य जी छत्तीसगढ़ी।
बैरी के मन के भरम ला, तोड़य जी छत्तीसगढ़ी।।
सुग्घर बादर के चादर ला, ओढ़य जी छत्तीसगढ़ी।
दुख-पीरा के रद्दा संगी, मोड़य जी छत्तीसगढ़ी।।
ठेठरी-खुरमी सोंहारी के जैसन, निक लागे छत्तीसगढ़ी।
बासी चटनी कइंचा मिर्चा सहीं, मीठ लागे छत्तीसगढ़ी।।
मुरदुंग, झांझ, मंजीरा जैसन, ताल सुनात छत्तीसगढ़ी।
बर बिहाव में मोंहरी जैसन, तान सुनात छत्तीसगढ़ी।।
ऐसे हमर महतारी भाखा हर, कैसे जी आगे बढ़ही।
जब लजाबो बोले ला हामर, सुग्घर भाखा छत्तीसगढ़ी।।
आओ किरिया करथन संगी, इतिहास नावां गढ़ही।
जब इस्कूल में किताब मा, पढ़ही सब छत्तीसगढ़ी।।
महतारी के मान बढ़ाबो, गोठियाबो छत्तीसगढ़ी।
पावन भुईयां मा नव जुग लाने, अपनाबो छत्तीसगढ़ी।।

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